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Thursday, October 03, 2019

जाने कभी


आज भी कभी जब तवे पर ऊँगली जल जाती है |
 ना जाने क्यों माँ की बहुत याद आती है ||

थम जाता हूँ दफ्तर का रुख करते हुए जब भी |
याद आते ही दस्तूर पिताजी का, कदम चल पड़ते है अपने आप ||

चुभते क्रेडिट कार्ड औ OTP की टुन टुन के बीच,
बरबस खींचती है ध्यान, कोने में रखी गुलक्क की खनक, आँखें मींच ||

और इसी सबके बीच autoplay ने टीवी पर चलाया

जाने कँहा मेरा जिगर गया जी। ..अभी अभी यही था किधर गया जी...

__फिर न जाने कभी __

Sunday, November 18, 2018

अलविदा कोई नही कहता, बस ऐसे ही चले जाते है


एक एक करके सब चले जाते है,
कुछ सुन कर कुछ कह कर चले जाते है दोस्त ।।

तन्हाई में क्या कहें, महफ़िलो में बहुत याद आते है,
एक एक करके सब चले जाते है दोस्त।।

कुछ को मौत तो कुछ को जिंदगी थका देती है,
तन्हाई में क्या कहें, महफ़िलो में बहुत याद आते है दोस्त ।।

अलविदा कोई नही कहता , बस ऐसे ही चले जाते है,
कुछ को मौत तो कुछ को जिंदगी थका देती है दोस्त ।।



Monday, July 03, 2017

अच्छा है अच्छा है जब तक ये बच्चा है

बच्चा  है बचपन है, बचपन का बचपना है
सच्चा है सज्जन है, सज्जन  का इम्तेहान है  |

आता है जाता है , कुछ कुछ गुन गुनाता है
मुझसे भी चलने को रोज़ ये कहता है |

तितलियों के पीछे नाहक ही भगाता है
गोदी में सर रख रोज़ ही सो जाता है  |

अच्छा है अच्छा है जब तक ये बच्चा है
सच्चा है सच्चा है मेरा ये अपना है |

Sunday, May 21, 2017

चलो कृष्ण अब चलो कृष्ण

बहुत देर से रुके हुए हो 
चलो कृष्ण आज चलते हैं |

बहुत कह लिया बेगानों से 
चलो कृष्ण आज अपनों को सुनते हैं | 

बहुत रह लिए किराये के घोंसलों में
चलो कृष्ण आज दिल ढूँढ़ते हैं |

बहुत शोर है यहाँ सब तरफ़ 
चलो कृष्ण आज अपने गीत गुनगुनाते हैं | 

बहुत उम्मीद से लोग नाम लेते हैं
चलो कृष्ण आज लिख ही देते हैं |

बहुत बहुत हो लिया 
चलो कृष्ण अब चलो कृष्ण !!!!

Sunday, January 01, 2017

पापा, ये जूता बहुत काटता है

पापा, ये जूता बहुत काटता है
सुबह शाम, सोते जागते, हर समय
ये जूता बहुत काटता है ।

जाने कब, कंहा ये जूता मैंने पहना था,
चाह कर भी उतार नहीं पाता हूँ,
पापा, ये जूता बहुत काटता है ।

मुझसे कहा था, "तू बड़ा है ।", इसलिए पहनना होगा ये जूता,
मोज़ो पर मोज़े चढ़ाये मैंने, पर फिर भी,
पापा ये जूता बहुत काटता है ।

to be continued....

Friday, November 25, 2016

वर्णन: सर्व चरण

प्रथम प्रहर प्रश्न प्रस्तुत करता है,
कौन है वो, किसके साथ अंक शयन करते हो ?

प्रथम प्रहर पुरुष प्रमाण देता है 
सखी है, संगिनी मेरी, उसी के साथ अंक शयन करता हूँ ।।

द्वितीय द्वार दर्प से द्वंद करता है,
स्वर्ण को त्याग, किसको आलिंगन करते हो ?

द्वितीय द्वार पर द्रव्य दर्शन देता है,
अभिसारिका मेरी, असीमित प्रेम से आलिंगन करता हूँ ।। 

तृतीय तर्क तृष्णा से तुष्ट होता है
विनम्र हो क्यों तिरस्कृत होते हो ?

तृतीय तर्क  तीक्ष्ण तान देता है 
अक्षम्य को क्षमा कर मंथन करता हूँ ॥ 

चतुर्थ चर्म चौसर पर चिहुँकता है 
धर्म को धारण कर, किसके लिए दाँव लगाते हो ?

चतुर्थ चर्म चहुँ ओर व्याप्त होता है 
कर्महीन कर्म को सत्यापित करता हूँ ॥ 

पंचम पर्व पार्थ पर प्रकट होता है 
क्यों भ्रम से भ्रमित भ्रमण करते हो ?

पंचम पर्व प्रभुत्व स्वीकार करता है 
विश्वास कर विश्व का वहन करता हूँ ||  

घमासान

बहुत दूर तक सूनसान है, जिंदगी न जाने कब से घमासान है ।
छायी न जाने कहाँ तक उदासी है, जिंदगी बहुत रोज़ से प्यासी है ॥

बहुत रोज़ से आँखें जागी हुई है, जाने कब से बस रोई नहीं है ।
ए खुदा इन्हें थोड़ी नींद बख़्श दे, इनमे थोड़ी शर्म रख दे ॥

Tuesday, July 19, 2016

अनकही

शब्दों से शब्द कहते हैं
तुम्हारे बिना हम अधूरे हैं..

अब किसी और रोज़ सुनेंगे तारीफें किसी और की
आज तो नश्तरों से नश्तर तेज़ कर बैठे हैं।

अनसुनी न रहे कोई दुआ तेरी,
खुदा के साथ सवेरे से पैमाना लिए बैठे हैं।

अब बहुत हुआ ए परवरदिगार इंतज़ार तेरा,
ईंटों को सिरहाने से हम लगा बैठे हैं।

Tuesday, July 05, 2016

तो कुछ अपना लिखना

जब मिले न कुछ, पढ़ने के क़ाबिल,
तो कुछ अपना लिखना,

जब मिले न वास्तव में, कोई पास अपना,
तो कोई सपना लिखना,

न दैन्यं न पलायनम, कह कर भी मन न माने
तो कृष्ण की सुनना,

जब सूझे न हाथ को हाथ, अंतर्मन को कर शांत, 
पुकारना एक बार, कृष्ण दिखेगा तुझे, अपने आस पास,

जब मिले न कुछ, पढ़ने के क़ाबिल,
तो कुछ अपना लिखना ||

Monday, April 18, 2016

चौदहवीं के चाँद सी, सागर के उफ़ान सी,


चौदहवीं के चाँद सी, सागर के उफ़ान सी,
ओस पर थिरकती थी, गुलाब सी महकती थी,
एक परी घर में रहती थी।
जाने किसने बहका दिया, क्या क्या किसीने कह दिया
उसे लोहे का और मुझे मिट्टी का कर दिया ॥

दिल में बिठा कर बरसों, अरमानो से सहलाया था,
चाँद तारों से आँचल को सजाया था,
एक परी को साथ लाया था ।
जाने कौन उसे बहला गया, धूप में दौड़ा कर
उसे लोहे का और मुझे मिट्टी का कर दिया ॥

उम्मीद है की वो नाहक दौड़ना छोड़, खुद को समझ पायेगी
लोहे के कवच से निकल, मिट्टी में भी खिलखिलाएगी,
वो सांझ जल्दी ही आएगी ॥ वो सांझ जल्दी ही आएगी॥

Monday, February 29, 2016

आज चाय में फिर चीनी नहीं है


आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
उफ़, ये दिन फिर से वहीं है।
उड़ कर आ जाता है रोज़ ये दिन,
रात भर सोता नहीं तारे गिन गिन।

आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
अहा, थिरकती रही उम्मीद, थमी नहीं है।
बारिशों में भीगी, भाग कर आई
गोदी में मेरी सिमट, ऐसे ही सोयी।

आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
हश्श, मेले में रोशनी कहीं कहीं है।
छन छन के आती रही चाँदनी ,
शहर आज गर्म नहीं है।

आज चाय में चीनी सही है ,
उंह, ये मीठी फिर भी नहीं है।
उठ रही है भाप बहुत देर से,
चाय अब ठंडी नहीं है।

Tuesday, February 09, 2016

कृष्ण-संयोग


दौड़ता भागता रहा कँहा जा रहा है,
वो देख तेरा कृष्ण यहीं आ रहा है।।

अकेला समझ खुद को क्यों चला जा रहा है
सुन तो सही, तेरा कृष्ण पुकार रहा है।

रुका है किसके लिए इतनी देर से धूप में
दरख़्त के नीचे देख,  तेरा कृष्ण पानी लिए खड़ा है

संयोग 

to be continued

Thursday, February 04, 2016

किसी राह में, किसी मोड़ पर


किसी राह में, किसी मोड़ पर
कही चल ना देना तू छोड़कर, मेरे हमसफ़र, मेरे हमसफ़र

किसी हाल में, किसी बात पर
कही चल ना देना तू छोड़कर, मेरे हमसफ़र, मेरे हमसफ़र

मेरा दिल कहे कहीं ये ना हो, नहीं ये ना हो, नहीं ये ना हो
किसी रोज तुझ से बिछड़ के मैं, तुझे ढूँढती फिरू दरबदर

तेरा रंग साया बहार का, तेरा रूप आईना प्यार का
तुझे आ नज़र में छुपा लू मैं, तुझे लग ना जाये कहीं नज़र

तेरा साथ है तो है जिंदगी, तेरा प्यार है तो है रोशनी
कहाँ दिन ये ढल जाये क्या पता, कहाँ रात हो जाये क्या खबर

~ मेरे हमसफ़र - 1970

Tuesday, June 23, 2015

आयो कृष्ण अब घर चलते हैं ।


चंद सिक्के हाथ में लिए चला जाता हूँ
आज  कुछ खुशिया खरीद लाता हूँ ।

सोच रहा हूँ बहुत रोज़ से तेरे बारे में
आज कुछ देर दर पर दस्तक दिए आता हूँ ।

 चंद अल्फ़ाज़ों को ही लिख़ लेता हूँ
आज ये ख़त तुझे भेज देता हूँ ।

थामे  हुए बहुत वक़्त हो चला है
आज ये पैमाने ख़ाली कर आता हूँ ।


चंद लोग दिखे दुनिया के मेले में
आज उन लोगो से मिल आता हूँ ।

बैठा हूँ बहुत रोज़ से इंतज़ार में
आज़ कुछ देर मैं भी सो जाता हूँ ।

चंद सिक्के ये बहुत  भारी हो चले हैं, कृष्ण अब तुम ही संभालो
चंद अल्फ़ाज़ कंहा कुछ बयां कर पाएंगे, कृष्ण अब तुम ही कुछ कहो ।

इंतज़ार बहुत हो चुका, आयो कृष्ण अब चलते हैं
कुछ नए ख़त तुम्हारी लेखनी से ही लिख लेते हैं ।

आगे मेले में बहुत भीड़ होगी, आयो कृष्ण अब चलते हैं
कुछ नयी खुशियां रास्ते में ही बिखेर देते हैं ।

अायो कृष्ण अब चलते हैं । सिक्के, अल्फ़ाज़, मुलाकात बहुत हो गया ।
आयो कृष्ण अब घर चलते हैं । आयो कृष्ण अब घर चलते हैं॥

Tuesday, June 02, 2015

तुझे याद कर फिर लौट रहा हूँ मैं।

आधी रात फिर उठ बैठा हूँ मैं।
तुझे याद कर फिर सिमट रहा हूँ मैं।

किसने क्या क्यूँ कहा भूल रहा हूँ मैं।
तुझे याद कर फिर झूल रहा हूँ मैं।

अकेले ही सबसे मिल रहा हूँ मैं।
तुझे याद कर फिर खिल रहा हूँ मैं।

सब कुछ जान कर भी अनजान बन रहा हूँ मैं।
तुझे याद कर फिर इन्सान बन रहा हूँ मैं।

गलत औ सही के पार उस मैदान पर पहुंच गया हूँ  मैं।
तुझे याद कर फिर लौट रहा हूँ मैं।
तुझे याद कर फिर लौट रहा हूँ मैं।


Thursday, May 07, 2015

पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा


पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा 
स्कूल गया तो मैं बड़ा हो जायूँगा ,
फिर आपकी गोदी कैसे आऊंगा ,
कैसे उंगली पकड़ आपकी मैं बाज़ार जायूँगा ,
पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा !!!

पापा मैं स्कूल नहीं जायूँगा 
स्कूल गया तो मैं भी रीति सीख जायूँगा ,
स्वाभिमान के बहाने दूर चला जायूँगा ,
कैसे फिर आपके हाथ से रोटी के निवाले खाऊंगा ,
पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा !!!

पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा 
स्कूल गया तो ये संसार वास्तव हो जायेगा ,
आपकी कहानियों का राजकुमार एक प्रतियोगी हो जायेगा ,
किसी अनजान दौड़ का चूहा या फिर किसी दीवार की ईंट बन चिन जायेगा ,
कैसे फिर आपके सीने पर  सर रख सो पायूँगा 
पापा, मैं स्कूल नहीं जायूँगा !!!

पापा , मैं स्कूल नहीं जायूँगा 
 मेरे बचपन को बचपना ही बने रहने दो ,
स्कूल एक साज़िश है, बड़ा होना - ये कैसी ख्वाहिश है ,
स्कूल एक भुलावा है, ये संसार छलावा है  ,
मुझे मेरे बचपन में जीने दो, कुछ भी करो पर मुझेअपनी गोदी में ही सोने दो ,
पापा , मैं स्कूल  नहीं जायूँगा , स्कूल गया तो मैं बड़ा हो जायूँगा !!!…

Tuesday, March 17, 2015

कृष्ण कहता है


कृष्ण कहता है - मोह न कर
पर जब तू इठलाता है, पालने में
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है ।

कृष्ण कहता है - संसार मिथ्या है
पर जब तू चलता है, थामे ऊँगली मेरी,
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है ।

कृष्ण कहता है - योगक्षेमं वहाम्यम्
पर जब मैं पहुचता हूँ, घर थक कर,
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है

कृष्ण कहता है - निष्काम कर्म कर
पर जब देखता हूँ, महीने में खाली जेब
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है।

कृष्ण कहता है - भविष्य की फ़िक्र न कर, 
पर जब पाता हूँ तुझे देर रात में भी पढ़ते हुए 
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है।

कृष्ण कहता है - शांतचित्त से समर्पण कर 
पर जब पहुचता हूँ मैं, हाथ जोड़ कर,
न जाने तब कृष्ण कँहा चला जाता है ।

कृष्ण कहता था - साथ रहेगा वो सदा 
अब जब भी चाहता हूँ मैं, भाग निकलना,
न जाने तब कृष्ण कँहा से चला आता है।

कृष्ण कहता था - तू मुझमे आ मिलेगा
आज मैं आ गया हूँ बैकुण्ठ के द्वार पर
वो देखो कृष्ण आ रहा है। वो देखो कृष्ण आ रहा है।

इति श्री।

Thursday, January 29, 2015

जलने के लिए


कल किसी से सुना
"हज़ारों साल  जलता है कोयला तब कहीं जाकर हीरा बनता है "

हमने कहा
"हज़ारो साल जलता है कोयला हीरा बनने के लिए, बहुत बड़ा जिगर चाहिए इतना जलने के लिए "

Monday, December 01, 2014

सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ


सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ
ये ज़मीं आसमां, बस धुँआ है धुँआ।

तुमने जो भी कहा, हमने जो भी सुना
वो सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ।

सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ
ये ज़मीं आसमां, बस धुँआ है धुँआ।

ये हँसी और ख़ुशी, या नमी आँखो की
बस धुँआ है धुँआ, सब धुँआ है धुँआ।

तुमने जो भी कहा, हमने जो भी सुना
वो सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ।

ये जिंदगी ख्वाब  है, या ख्वाब है जिंदगी
सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ।

जो कहानी कही उस खुदा ने कभी, जज़्बात में है बंधी ये खुदाई कहीं 
मेरी नज़रों में वो सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ। 

सब धुँआ है धुँआ, बस धुँआ है धुँआ
ये ज़मीं आसमां, बस धुँआ है धुँआ।

Thursday, November 06, 2014

मेरी दिल्ली को मेरा सलाम है


थोड़ा झंझट है थोड़ा बबाल है, 
इधर उधर का सबको ख्याल है, 
मेरी दिल्ली तो एक कमाल है

कुछ आधा है तो कुछ अधूरा है
कहीं कहीं ही कुछ पूरा है
थोड़ा किस्सा है, थोड़ी कहानी है
मेरी दिल्ली में एक रवानी है ।

 सब कुछ दिखता है, कुछ भी बिकता है 
हल्का हल्का भुनता औ धुनता है
मेरी दिल्ली में कभी कुछ नहीं रुकता है

भीनी सी सुबह, महकी सी शाम है
अजब सा चहुँ ओर घाम है
मेरी दिल्ली एक ताम झाम है।

खुदा की तारीफ है , राम की बलिहारी है 
हर गली में राधा-श्याम की छटा न्यारी है 
मेरी दिल्ली में हर ख़ास -ओ- आम है
मेरी दिल्ली को मेरा सलाम है। 

मेरी दिल्ली को मेरा सलाम है।