Friday, November 25, 2016

वर्णन: सर्व चरण

प्रथम प्रहर प्रश्न प्रस्तुत करता है,
कौन है वो, किसके साथ अंक शयन करते हो ?

प्रथम प्रहर पुरुष प्रमाण देता है 
सखी है, संगिनी मेरी, उसी के साथ अंक शयन करता हूँ ।।

द्वितीय द्वार दर्प से द्वंद करता है,
स्वर्ण को त्याग, किसको आलिंगन करते हो ?

द्वितीय द्वार पर द्रव्य दर्शन देता है,
अभिसारिका मेरी, असीमित प्रेम से आलिंगन करता हूँ ।। 

तृतीय तर्क तृष्णा से तुष्ट होता है
विनम्र हो क्यों तिरस्कृत होते हो ?

तृतीय तर्क  तीक्ष्ण तान देता है 
अक्षम्य को क्षमा कर मंथन करता हूँ ॥ 

चतुर्थ चर्म चौसर पर चिहुँकता है 
धर्म को धारण कर, किसके लिए दाँव लगाते हो ?

चतुर्थ चर्म चहुँ ओर व्याप्त होता है 
कर्महीन कर्म को सत्यापित करता हूँ ॥

घमासान

बहुत दूर तक सूनसान है, जिंदगी न जाने कब से घमासान है ।
छायी न जाने कहाँ तक उदासी है, जिंदगी बहुत रोज़ से प्यासी है ॥

बहुत रोज़ से आँखें जागी हुई है, जाने कब से बस रोई नहीं है ।
ए खुदा इन्हें थोड़ी नींद बख़्श दे, इनमे थोड़ी शर्म रख दे ॥

Monday, October 24, 2016

Salt n Pepper

It's always been salt n pepper...do not know what took me so long to realize it again....anyhow now since it's been sorted once more...life is here to ride... :)

a new day...with the revelations of course...

Salt n Pepper...45 days....21 days to pour the habit...21 days to bounce... and 3 days to rake it all...

remember ...it Salt n Pepper always...


Tuesday, July 19, 2016

अनकही

शब्दों से शब्द कहते हैं
तुम्हारे बिना हम अधूरे हैं..

अब किसी और रोज़ सुनेंगे तारीफें किसी और की
आज तो नश्तरों से नश्तर तेज़ कर बैठे हैं।

अनसुनी न रहे कोई दुआ तेरी,
खुदा के साथ सवेरे से पैमाना लिए बैठे हैं।

अब बहुत हुआ ए परवरदिगार इंतज़ार तेरा,
ईंटों को सिरहाने से हम लगा बैठे हैं।

Tuesday, July 05, 2016

तो कुछ अपना लिखना

जब मिले न कुछ, पढ़ने के क़ाबिल,
तो कुछ अपना लिखना,

जब मिले न वास्तव में, कोई पास अपना,
तो कोई सपना लिखना,

न दैन्यं न पलायनम, कह कर भी मन न माने
तो कृष्ण की सुनना,

जब सूझे न हाथ को हाथ, अंतर्मन को कर शांत, 
पुकारना एक बार, कृष्ण दिखेगा तुझे, अपने आस पास,

जब मिले न कुछ, पढ़ने के क़ाबिल,
तो कुछ अपना लिखना ||

Monday, April 18, 2016

चौदहवीं के चाँद सी, सागर के उफ़ान सी,


चौदहवीं के चाँद सी, सागर के उफ़ान सी,
ओस पर थिरकती थी, गुलाब सी महकती थी,
एक परी घर में रहती थी।
जाने किसने बहका दिया, क्या क्या किसीने कह दिया
उसे लोहे का और मुझे मिट्टी का कर दिया ॥

दिल में बिठा कर बरसों, अरमानो से सहलाया था,
चाँद तारों से आँचल को सजाया था,
एक परी को साथ लाया था ।
जाने कौन उसे बहला गया, धूप में दौड़ा कर
उसे लोहे का और मुझे मिट्टी का कर दिया ॥

उम्मीद है की वो नाहक दौड़ना छोड़, खुद को समझ पायेगी
लोहे के कवच से निकल, मिट्टी में भी खिलखिलाएगी,
वो सांझ जल्दी ही आएगी ॥ वो सांझ जल्दी ही आएगी॥

Monday, February 29, 2016

आज चाय में फिर चीनी नहीं है


आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
उफ़, ये दिन फिर से वहीं है।
उड़ कर आ जाता है रोज़ ये दिन,
रात भर सोता नहीं तारे गिन गिन।

आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
अहा, थिरकती रही उम्मीद, थमी नहीं है।
बारिशों में भीगी, भाग कर आई
गोदी में मेरी सिमट, ऐसे ही सोयी।

आज चाय में फिर चीनी नहीं है ,
हश्श, मेले में रोशनी कहीं कहीं है।
छन छन के आती रही चाँदनी ,
शहर आज गर्म नहीं है।

आज चाय में चीनी सही है ,
उंह, ये मीठी फिर भी नहीं है।
उठ रही है भाप बहुत देर से,
चाय अब ठंडी नहीं है।